सोन की आवाज न्यूज़ मंडल ब्यूरो चीफ जगरनाथ प्रसाद बिंद
सेकंड एडी के रूप में फिल्म से जुड़े शशांक सिंह तोमर बोले—कुछ यात्राएं हम तय नहीं करते, वे खुद हमें अपने साथ ले जाती हैं
सोनभद्र। फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सफलता के बीच फिल्म से जुड़ी फिल्ममेकर शशांक सिंह तोमर की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। फिल्म में सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने वाले शशांक को शुरुआत में इसी फिल्म में फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में जुड़ने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उस समय उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था।
दरअसल, उस वक्त शशांक अपनी फिल्म ‘पहरेदार’ की कहानी और स्क्रीनप्ले लिखने में पूरी तरह व्यस्त थे। अपनी फिल्म पर पूरा ध्यान केंद्रित करने के कारण उन्होंने ‘हनुमान अंश’ के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उन्हें उस समय यह अंदाजा भी नहीं था कि कुछ समय बाद यही फिल्म दोबारा उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए बुलाएगी।
शशांक सिंह तोमर बताते हैं कि उस समय उनका पूरा फोकस ‘पहरेदार’ पर था। इसलिए फर्स्ट एडी के तौर पर ‘हनुमान अंश’ से जुड़ने का प्रस्ताव आने पर उन्होंने साफ मना कर दिया। लेकिन कहानी ने कुछ ही समय बाद नया मोड़ लिया।
जब ‘पहरेदार’ लेखन से आगे बढ़कर तैयारी और रेकी के दौर में पहुंची, तभी ‘हनुमान अंश’ की टीम ने शशांक से दोबारा संपर्क किया। फिल्म में सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर जुड़े शोभिनव सत्या को जब नीम करौली बाबा की भूमिका निभानी पड़ी, तो शूटिंग के लिए टीम को एक अनुभवी असिस्टेंट डायरेक्टर की जरूरत महसूस हुई।
शशांक के मुताबिक, टीम की ओर से उन्हें कहा गया—“हमें पता है कि तुम फर्स्ट एडी के तौर पर काम करते हो, लेकिन हमारा सेकंड एडी अब फिल्म में अभिनय कर रहा है। हमें एक अनुभवी व्यक्ति की जरूरत है, क्या तुम आ सकते हो?”
उस वक्त शशांक खुद ‘पहरेदार’ की रेकी कर रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उनका कहना था कि “विशाल सर के लिए मैं जरूर आऊंगा।” इसके बाद वह ‘हनुमान अंश’ से सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में जुड़ गए।
शूटिंग का अनुभव बना यादगार
शशांक बताते हैं कि ‘हनुमान अंश’ में काम करने का अनुभव उनके लिए महज एक फिल्म की शूटिंग तक सीमित नहीं रहा। शूटिंग के दौरान कुछ ऐसी घटनाएं और अनुभव हुए, जिन्हें वह आज भी पूरी तरह शब्दों में बयां नहीं कर पाते।
उनका कहना है कि उन्होंने वहां कुछ ऐसे अनुभव महसूस किए, जिन्हें सिर्फ संयोग मान लेना उनके लिए आसान नहीं है। फिल्म में काम करने पहुंचे शशांक के भीतर इस यात्रा के बाद बाबा को लेकर एक अलग तरह का विश्वास पैदा हुआ।
सबसे खास बात यह रही कि जिस ‘पहरेदार’ को लिखने की वजह से उन्होंने पहली बार ‘हनुमान अंश’ का प्रस्ताव ठुकराया था, उसी फिल्म से जुड़ी कई घटनाएं बाद में उनके लिए एक अलग ही मायने लेने लगीं।
शशांक इसे किसी चमत्कार का दावा नहीं बताते। वह कहते हैं कि यह उनका निजी अनुभव है, जिसे वह कभी भूल नहीं सकते।
‘पहरेदार’ और ‘हनुमान अंश’ की कहानी का अनोखा संयोग
आज ‘पहरेदार’ का निर्माण पूरा हो चुका है और फिल्म पोस्ट-प्रोडक्शन के दौर से भी गुजर चुकी है। वहीं दूसरी ओर ‘हनुमान अंश’ को दर्शकों का प्यार मिलने के बाद शशांक अपनी पूरी यात्रा को एक बेहद खूबसूरत संयोग के रूप में देखते हैं।
शशांक कहते हैं—“पहली बार मैंने फिल्म को मना किया था क्योंकि मैं अपनी फिल्म लिख रहा था। दूसरी बार जब फोन आया, तब मैं उसी फिल्म की रेकी कर रहा था। फिर मैं ‘हनुमान अंश’ का हिस्सा बना। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि शायद कुछ यात्राएं हम तय नहीं करते, वे खुद हमें अपने साथ ले जाती हैं।”
शशांक सिंह तोमर के लिए ‘हनुमान अंश’ अब सिर्फ उनके फिल्मी करियर का एक क्रेडिट नहीं, बल्कि उनके निर्देशन की यात्रा और ‘पहरेदार’ से जुड़ी ऐसी याद बन चुकी है, जिसने उनके व्यक्तिगत अनुभवों और विश्वास को भी एक नया आयाम दिया है।


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