Top News

​मन्नापुर का अंधेरा और व्यवस्था का बहरापन: जब आधी रात को आंधी-तूफान के बीच हार गई इंसानियत

 

​एक अदद बिजली के लिए तरसती तीन पीढ़ियां, ₹600 की अवैध वसूली, और एक सजग पत्रकार के अटूट भरोसे को छलने वाला बिजली विभाग का तानाशाही तंत्र।

​सोन की आवाज न्यूज़ रिपोर्टर चंदौली ब्यूरो चीफ टीपू सुल्तान



21वीं सदी के भारत में जब हम डिजिटल क्रांति, 'मेक इन इंडिया' और हर गांव तक निर्बाध बिजली पहुंचाने के बड़े-बड़े विज्ञापनों को अखबारों के मुखपृष्ठ पर देखते हैं, तो दिल को एक तसल्ली मिलती है। लेकिन जब हम इसी व्यवस्था को धरातल पर तड़पते और सिसकते देखते हैं, तो वे सारे दावे कागजी और खोखले नजर आने लगते हैं। जनपद चंदौली के सकलडीहा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली ग्राम सभा मन्नापुर में पिछले 72 घंटों से जो कुछ घट रहा है, वह सिर्फ एक 25 KVA के बिजली ट्रांसफार्मर के जलने और लगने की कहानी नहीं है। यह कहानी है—अधिकारियों की संवेदनहीनता की, एक सजग नागरिक की सक्रियता के अपमान की, और पूरी रात आंधी-तूफान के बीच इंसानियत के छले जाने की।

​## 1. मन्नापुर का वो मार्मिक दृश्य: थमी सांसें और पथराई आंखें


बीते 8 जून 2026 को मन्नापुर गांव का ट्रांसफार्मर भीषण गर्मी और ओवरलोड के कारण धूं-धूं कर जल गया। एक झटके में पूरा गांव उमस और अंधेरे के उस नरक में धकेल दिया गया, जहां हवा भी थमी हुई महसूस हो रही थी। लगातार प्रयासों और कड़े हस्तक्षेप के बाद, जब 9 जून की शाम ठीक 5:00 बजे नया ट्रांसफार्मर गांव की सीमा में दाखिल हुआ और शाम 7:00 बजे उसे पोल पर चढ़ाया जाने लगा, तब वहां एक ऐसा मार्मिक दृश्य उपस्थित हुआ जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर दे।

​वहां केवल अबोध बच्चे नहीं थे जो गर्मी से बेहाल होकर रो रहे थे। वहां गांव के वो नौजवान भी थे जो दिनभर खेतों और मजदूरी में हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद एक रात के सुकून की नींद के लिए तरस रहे थे। वहां अपनी उम्र के कई दशक देख चुके वो बुजुर्ग भी थे, जो लाठी टेककर, बिना पलक झपकाए, टकटकी लगाकर उस लोहे के बक्से (ट्रांसफार्मर) को ऊपर चढ़ते देख रहे थे। बुजुर्गों की वो पथराई आंखें इस कदर उम्मीद से भरी थीं, मानो वहां बिजली का कोई उपकरण नहीं, बल्कि पूरे मन्नापुर गांव की थमी हुई धड़कनें दोबारा जोड़ी जा रही हों। हर उम्र के इंसान की सांसें थमी हुई थीं कि ‘बस अब चालू होगा... अब अंधेरा छटेगा... अब हमारे घरों में रोशनी आएगी।’

​## 2. भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें: पहले 'धन उगाही', फिर त्रासदी

​इस मानवीय संकट के पीछे बिजली विभाग के करप्शन का वो घिनौना चेहरा भी सामने आया है, जो ग्रामीण अंचलों में एक आम बात बन चुका है। सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, इस ट्रांसफार्मर में तकनीकी खराबी की शुरुआत 7 जून को ही हो गई थी। जब विभागीय कर्मचारियों को मौके पर बुलाकर इसे ठीक कराया गया, तो संवेदनहीन कर्मचारियों ने क्षेत्रीय गरीब जनता की बेबसी का फायदा उठाते हुए 'जेब खर्च' और 'सुविधा शुल्क' के नाम पर करीब ₹600 की अवैध धन उगाही की।

​ग्रामीणों ने इस उम्मीद में अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे सौंप दिए कि शायद उन्हें इस भीषण उमस से निजात मिल जाएगी। लेकिन भ्रष्ट आचरण और कामचोरी का नतीजा यह रहा कि अगले ही दिन, यानी 8 जून को वह ट्रांसफार्मर पूरी तरह जल गया। इसके बाद ग्रामीणों ने लगातार, न जाने कितने अलग-अलग नंबरों से विभाग को गुहार लगाई, लेकिन विभाग 'झूठ-झपाट' और टालमटूल का खेल खेलता रहा। 9 जून की सुबह 7:00 बजे ही अंतिम आधिकारिक सूचना दे दी गई थी, लेकिन तानाशाही रवैये के चलते ट्रांसफार्मर को शाम 5:00 बजे तक लटका कर रखा गया।

​## 3. रात 12:00 बजे से 2:30 बजे तक: आंधी-तूफान में डटा रहा पत्रकार, पर सोता रहा सिस्टम


9 जून की रात 10:58 बजे बिजली विभाग के जेई (JE) अभिषेक श्रीवास्तव से मेरी फोन पर लंबी और सकारात्मक बातचीत हुई। जेई ने भावनात्मक रूप से सहयोग करने का ढोंग करते हुए मुझसे स्पष्ट वादा किया कि रात के ठीक 12:00 बजे तक ट्रांसफार्मर को चार्ज करके कनेक्शन जोड़ दिया जाएगा।

​एक जिम्मेदार पत्रकार, सजग नागरिक और हमेशा बिजली कर्मचारियों की हर संभव मदद करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते, मैंने इसे अपनी नैतिक और भौतिक जिम्मेदारी समझा। यह मेरा व्यक्तिगत ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि जब भी रात-बिरात कोई लाइनमैन गांव में काम करने आता था, तो मैं खुद आगे बढ़कर उन्हें चाय-पान का खर्च देता था। कई बार पेट्रोल पंप पर खड़े विभागीय कर्मचारियों की गाड़ियों में अपने पास से तेल डलवाया। यहाँ तक कि जब कभी 11,000 वोल्ट की मुख्य लाइनों में ब्रेकडाउन होता था, तो फॉल्ट ढूंढने के लिए मैं खुद कर्मचारियों के साथ या अकेले जंगलों और खेतों में निकल पड़ता था।

​इसी इंसानियत और सक्रियता के नाते, मैं ठीक रात 12:00 बजे मन्नापुर मौके पर पहुंच गया ताकि रात के सन्नाटे में काम करने आने वाले लाइनमैन को अकेले में कोई असुविधा या खतरा न हो। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रात 12:00 बजे के बाद अचानक मौसम ने भयानक करवट ली। आसमान में धूल का गुबार उठा, तेज आंधी चली और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। इस विकट और डरावनी परिस्थिति में भी मैं पीछे नहीं हटा। मैंने अधिकारियों को फोन कर साफ कहा कि मैं अपनी जनता के हक के लिए रात के 2:00 बजे तक भीगते हुए भी इंतजार करूँगा।

​तारीख बदली, 9 जून बीतकर 10 जून की भोर लग गई, और मैं रात के 2:30 बजे तक उस तूफान में अकेला खड़ा रहा। लेकिन विभाग के जेई और कर्मचारी फोन पर सिर्फ सफेद झूठ की स्क्रिप्ट पढ़ते रहे। कभी बहाना बनाया गया कि "कर्मचारी खाना खा रहे हैं", तो कभी सफेद झूठ बोला गया कि "कर्मचारी मुगलसराय से आ रहे हैं, देर लगेगी।" जेई लगातार कागजी दावे करते रहे कि उन्होंने आदेश दे दिया है, लेकिन धरातल पर कोई नहीं आया। अंततः जब रात के 2:30 बजे यह साफ हो गया कि कोई नहीं आने वाला, तो मेरा वह अटूट भरोसा और सक्रियता का जज्बा पूरी तरह आहत हो गया, और मैं अत्यंत निराश मन से वापस लौटा।

​## 4. सरकारी नीतियां बनाम विभागीय उदासीनता

​इस पूरे घटनाक्रम की जब हम गहराई से समीक्षा करते हैं, तो बिजली विभाग की इस लाचारी के पीछे एक कड़वा और बड़ा नीतिगत सच भी सामने आता है। सच्चाई यह है कि बिजली विभाग इस समय कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है। विभाग में संविदा पर काम करने वाले लाइनमैनों और तकनीशियनों की संख्या नाममात्र की रह गई है। जो पुराने और अनुभवी स्थाई कर्मचारी थे, उनके सेवानिवृत्त (रिटायर) होने के बाद सरकार द्वारा रिक्त पदों पर नई भर्तियां नहीं की गईं।

​यहाँ सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियां भी आलोचना के घेरे में हैं। यदि सरकार बिजली विभाग को पर्याप्त मानव संसाधन (कर्मचारी) उपलब्ध नहीं कराएगी, तो ये विभाग काम कहां से करवाएगा? रिक्त पड़े पदों पर नई नियुक्तियां न होना ही इस लचर व्यवस्था की सबसे बड़ी जड़ है, जिसका खामियाजा टैक्स भरने वाली आम जनता को इस भीषण गर्मी में भुगतना पड़ रहा है। लेकिन इस कमी की आड़ लेकर अधिकारियों द्वारा लगातार झूठ बोलना, टालमटूल करना और तानाशाही रवैया अपनाना किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

## 5. निष्कर्ष: यह लड़ाई अब सिर्फ बिजली की नहीं है

​आज 10 जून की सुबह हो चुकी है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) के नियमों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतम 48 घंटे के भीतर आपूर्ति बहाल होनी चाहिए, लेकिन मन्नापुर गांव में अब तक ट्रांसफार्मर का कनेक्शन नहीं जोड़ा गया है। पूरा गांव आज भी अंधेरे की आगोश में सिसक रहा है।

​अगर मेरे जैसे सक्रिय, जागरूक और हमेशा विभाग के सुख-दुख में खड़े रहने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार को ये अधिकारी इस तरह आंधी-तूफान के बीच रात के ढाई बजे तक खड़ा रखकर क्रूर धोखा दे सकते हैं, तो आम और लाचार ग्रामीण जनता के साथ ये क्या करते होंगे, इसका अंदाजा लगाना भी डरावना है। बिजली विभाग आज चंदौली में करप्शन और संवेदनहीनता का सबसे बड़ा पर्याय बन चुका है। पैसे लेने के बावजूद इनकी इंसानियत इतनी मर चुकी है कि इन्हें तड़पते हुए बुजुर्गों-बच्चों की कोई परवाह नहीं है। यह लड़ाई अब सिर्फ बिजली के एक कनेक्शन की नहीं है, बल्कि इस भ्रष्ट, निकम्मे तंत्र और दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के खात्मे की है। मन्नापुर की जनता को उनका हक दिलाने के लिए इस मामले को ऊर्जा मंत्री और शासन के आला अधिकारियों तक लिखित रूप में ले जाया जाएगा।

Post a Comment

Previous Post Next Post
 Son Ki Awaz News
 Son Ki Awaz News

🎧 LIVE FM RADIO




🔊 Volume