*ग़ज़ल*
सख्त मुश्किल में भी आसान बने बैठे हैं
अपने मांझी से ये नादान बने बैठे हैं
जिनका अपना कभी दरबार सजा करता था
आज वो लोग भी दरबान बने बैठे हैं
वक्त की मार ने सब रंग बदल डाले हैं
कल जो शहंशाह थे, हैरान बने बैठे हैं
जिनके लहजे में कभी हुक्म चला करता था
आज खामोश से इंसान बने बैठे हैं
दौर ऐसा है कि सच बोलना जुर्मों सा लगे
झूठ वाले यहां भगवान बने बैठे हैं
जो उजालों की हिफाज़त में खड़े रहते थे
आज अंधेरों के निगहबान बने बैठे हैं
दिल में नफरत लिए चेहरे पे मुस्कान लिए
कैसे-कैसे यहां मेहमान बने बैठे हैं
वक्त जब करवटें लेता है सिखा देता है
कितने तूफान भी सुनसान बने बैठे हैं
यासीन सच की कलम रुकने न देना हरगिज़
झूठ के मेले में पहचान बने बैठे हैं
*भावार्थ*
यह ग़ज़ल जीवन की सच्चाइयों, समय के बदलाव और समाज की विडंबनाओं को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।
*“सख्त मुश्किल में भी आसान बने बैठे हैं…”*
शायर कहता है कि कुछ लोग कठिन परिस्थितियों में भी सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश करते हैं, जबकि अंदर से वे संघर्ष कर रहे होते हैं।
*“अपने मांझी से ये नादान बने बैठे हैं…”*
मांझी यानी राह दिखाने वाला। लोग अपने मार्गदर्शक या नेता के सामने भी अनजान बनने का दिखावा करते हैं।
*“जिनका अपना कभी दरबार…”*
जो लोग कभी सत्ता, सम्मान और प्रभाव रखते थे, समय बदलने पर वही दूसरों के अधीन हो गए।
*समय की ताकत*
ग़ज़ल बार-बार यह बताती है कि समय सबसे बड़ा शिक्षक है—राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है।
*सच और झूठ का संघर्ष*
आज के दौर में झूठ बोलने वाले अधिक सम्मान पा रहे हैं, जबकि सच बोलने वालों को संघर्ष करना पड़ रहा है।
*अंतिम संदेश*
शायर यासीन खान खुद से और समाज से कहता है कि सच की आवाज़ कभी बंद नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यही असली पहचान है।
यह ग़ज़ल सत्ता, समय, स्वार्थ और सच्चाई—चारों पर गहरा प्रहार करती है।

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