विशेष ब्यूरो रिपोर्ट: सोन की आवाज न्यूज़ शेख टीपू सुल्तान
स्थान: कटेसर (चंदौली) - कोदोपुर (रामनगर, वाराणसी)
वाराणसी/चंदौली । सरकारी विभागों के बीच तालमेल की कमी कहें या 'अंधेर नगरी चौपट राजा' वाला ढर्रा, इसका एक बेहद अनूठा और शर्मनाक नजारा कटेसर (चंदौली) और कोदोपुर (रामनगर, वाराणसी) के सीमावर्ती गंगा तटीय इलाकों में देखने को मिला है। गंगा नदी के तट से 500 मीटर के तथाकथित प्रतिबंधित दायरे में वाराणसी विकास प्राधिकरण (VDA) का पीला पंजा गर्जा और देखते ही देखते कई बाउंड्री वॉल और निर्माण कार्य मलबे में तब्दील हो गए। वीडीए का बड़ा सीधा और मासूम सा तर्क है— "हुजूर, बिना लेआउट पास कराए अवैध रूप से प्लॉटिंग की जा रही थी।"
लेकिन इस ध्वस्तीकरण की चमचमाती हेडलाइंस के पीछे छिपे उस कड़वे सच और सरकारी अंतर्विरोध पर बात करना बेहद जरूरी है, जहां मलाई तो सरकारी सिस्टम के नुमाइंदे खाते हैं और बुल्डोजर का पूरा तेल आम जनता की जेब से निकलता है।
राजस्व विभाग का 'दिव्य चश्मा': जब जमीन प्रतिबंधित थी, तो रजिस्ट्री की मलाई क्यों खाई?
इस पूरे खेल की पहली और सबसे दिलचस्प पटकथा राजस्व विभाग (निबंधन कार्यालय) के दफ्तर में लिखी जाती है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और शासन के नियम चीख-चीख कर कहते हैं कि गंगा तट के 500 मीटर के दायरे में कोई भी पक्का निर्माण या कमर्शियल प्लॉटिंग पूरी तरह वर्जित है।
लेकन मज़ाल है कि रजिस्ट्री दफ्तर के बाबू और अधिकारियों को यह नियम दिखाई दे जाए! जैसे ही भू-माफिया और आम जनता जमीन की रजिस्ट्री कराने पहुंचती है, अधिकारियों की आंखों पर एक 'दिव्य चश्मा' चढ़ जाता है, जिसे सिर्फ स्टांप ड्यूटी (रजिस्ट्री शुल्क) का राजस्व दिखाई देता है। अगर यह जमीन प्रतिबंधित है और सिर्फ खेती के लिए है, तो सरकार ने जनता से लाखों रुपये का टैक्स लेकर उसे वैध तरीके से खरीदार के नाम ट्रांसफर क्यों किया? क्या सरकार का एक हाथ दूसरे हाथ की बंदिशों से अनजान है, या फिर यह जनता की जेब पर डाका डालने का कोई आधुनिक सरकारी फॉर्मूला है?
वीडीए का 'कुंभकर्णी सिंडिकेट': बाउंड्री वॉल पूरी होने तक का इंतजार क्यों?
दूसरा तीखा कटाक्ष वाराणसी विकास प्राधिकरण (VDA) की अनोखी कार्यशैली पर उठता है। वीडीए का प्रवर्तन दल और इलाके के जिम्मेदार अधिकारी अक्सर तब तक 'कुंभकर्णी नींद' का आनंद लेते हैं, जब तक कि खेतों को पाटकर रास्ते न बन जाएं, ईंट-गिट्टी न गिर जाए और बाउंड्री वॉल न खड़ी हो जाए।
आखिर कोई भी निर्माण रातों-रात और छिपकर तो होता नहीं। तो क्या वीडीए के अधिकारी जानबूझकर तब तक का इंतजार करते हैं जब तक कि कोई गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जीवनभर की कमाई उस जमीन पर न लगा दे? जब जनता का पैसा पूरी तरह पानी में बह जाता है, तब अचानक वीडीए का 'अवैध निर्माण विरोधी' जमीर जागता है और वो बुलडोज़र लेकर बहादुरी दिखाने निकल पड़ते हैं। शुरुआती दौर में जब नींव रखी जा रही थी, तब इन अधिकारियों की सक्रियता किस वीआईपी डयूटी में व्यस्त थी?
पब्लिक का दोहरा शोषण: एक ही थाली के दो चट्टे-बट्टे
यह सीधे तौर पर एक ही सरकार के दो विभागों की ऐसी नूराकुश्ती है, जिसमें मोहरा हमेशा बेकसूर जनता को बनाया जाता है। जनता की खता बस इतनी है कि उसने सरकार के एक अंग (राजस्व विभाग) पर भरोसा किया, बकायदा टैक्स चुकाया और जमीन खरीदी। लेकिन उसे क्या पता था कि सरकार की ही दूसरी शाखा (VDA) उसकी इस कानूनी खरीद को गैर-कानूनी साबित करने के लिए बुल्डोजर में डीजल भरवा रही है।
यह ध्वस्तीकरण की कार्रवाई दरअसल प्रशासनिक विफलता का एक खुला और भद्दा प्रदर्शन है। अगर ज़मीन पर निर्माण अवैध था, तो पहला बुल्डोजर उस रजिस्ट्री अधिकारी की कलम पर चलना चाहिए था जिसने प्रतिबंधित जमीन की रजिस्ट्री की। दूसरा बुल्डोजर वीडीए के उन क्षेत्रीय अधिकारियों की कुर्सी पर चलना चाहिए था जिनकी नाक के नीचे हफ्तों तक यह काम चलता रहा।
बड़ा सवाल:
क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ जनता के आशियाने और बाउंड्री को मलबे में तब्दील करने तक ही सीमित है? प्रतिबंधित क्षेत्रों में रजिस्ट्री को रोकने के लिए दोनों विभागों के बीच आज के डिजिटल दौर में भी कोई तालमेल क्यों नहीं है? जब तक अवैध रजिस्ट्री करने वाले बाबुओं और समय रहते आंखें मूंदे रहने वाले अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा, तब तक 'अवैध निर्माण' के नाम पर जनता का यह दोहरा आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न कभी बंद नहीं होने वाला।



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