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*आशा-प्रतिक्षा के त्याग में सुख*

 



*याद रखो—जो दूसरोंसे सुखकी आशा न रखकर अपनी योग्यता के अनुसार दूसरोंको सुख पहुँचाने के प्रयत्न में लगा रहता है, वही सुखी होता है। उसे कभी आशा भङ्ग या निराशा का दुःख नहीं भोगना पड़ता, न कभी दूसरोंके किसी कार्यको उनके कर्तव्यपालन की अवहेलना मानकर ही उसे दुःख या क्रोध होता है।*

*यदि तुम अपने प्राप्त साधनोंसे—चाहे वे अत्यन्त नगण्य ही क्यों न हों—दूसरोंको सुख पहुँचाने का प्रयत्न करते रहोगे तो तुम्हारे वे साधन उत्तरोत्तर बढ़ते रहेंगे—तुम्हारे अन्दर दूसरोंको सुख पहुँचाने की प्रवृत्ति और शक्ति भी बढ़ेगी और तभी तुम दूसरोंके साथ रहने के यथार्थ अधिकारी बनोगे। समझ रखो—दूसरोंके साथ रहने का वही अधिकारी है जो दूसरों को सुख पहुँचाता है और सदा उनका हित देखता है।*

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🌷आपका दिन मंगलमय हो।🌷

        🙏धन्यवाद।🙏

रामआश्रय बिंद प्रधान संपादक 

दैनिक सोनभद्र उजाला एवं सोन की आवाज न्यूज़ 

9554175344,9335932664

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          *2026*




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