✍️ ग़ज़ल ✍️
धूप कितनी भी हो साया नहीं खोने देता,
राह कैसी भी हो बेबस नहीं होने देता।
बेच कर अपना लहू रोटी चाहे जैसी लाए,
बाप औलाद को भूखा नहीं सोने देता।
थक के गिरता है मगर हौसला मरने न दे,
वक्त उसको कभी घुटनों पे भी रोने न दे।
अपने हिस्से की खुशी बांट के बच्चों में सदा,
दिल का राजा है, खुद को कभी छोटा न दे।
सर्द रातों में भी सीने को अलावों सा रखे,
घर के आंगन में कभी दर्द को बोने न दे।
खुद फटे हाल सही, बच्चों को सजाता है मगर,
उनकी आंखों में कभी अश्क पिरोने न दे।
धूप, बारिश, कभी तूफान से लड़ता है जो,
अपने परिवार का विश्वास भी खोने न दे।
मां की ममता का सहारा है, दुआओं का असर,
बाप बच्चों को कभी राह से होने न दे।
जिंदगी भर जो कमाता है उन्हीं अपनों के लिए,
अपने अरमानों को अक्सर ही संजोने न दे।
कर्ज, मुश्किल, कभी हालात सताते भी रहें,
फिर भी चेहरे पे शिकन घर में वो होने न दे।
यासीन ऐसे फरिश्तों का कोई मोल नहीं,
जो खुद जलते हैं मगर घर को अंधेरा न दे।
✍️ पत्रकार यासीन खान🖋️
🌹 भावार्थ
यह ग़ज़ल एक पिता के त्याग, संघर्ष और निस्वार्थ प्रेम को समर्पित है। पिता चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियों से गुज़रे, कितनी भी धूप, गरीबी, परेशानी या अभाव झेले, लेकिन वह अपने बच्चों को कभी तकलीफ़ महसूस नहीं होने देता। वह अपनी इच्छाओं, खुशियों और आराम का बलिदान कर देता है ताकि उसके परिवार के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे।
ग़ज़ल का मूल संदेश यह है कि पिता वह मजबूत साया है जो स्वयं तपकर भी अपने बच्चों को जीवन की धूप से बचाता है। उसकी मेहनत, त्याग और प्रेम का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि वह अपने परिवार के लिए हर दर्द सह लेता है, लेकिन उन्हें भूखा, निराश या बेबस नहीं देख सकता।
✍️ पत्रकार यासीन खान🖋️
"बाप वह बरगद है जिसकी छांव में औलाद की पूरी दुनिया सुरक्षित रहती है।"
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*खेत-खलिहान प्यासे तरसते रहे*
खेत-खलिहान प्यासे तरसते रहे,
और झीलों पे बादल बरसते रहे।
जिसको मिलना था पानी, उसे कुछ न मिला,
भाग्य के फैसले यूँ ही बदलते रहे।
घर बचाने मेरा कोई आया नहीं,
आग लगती रही, लोग हँसते रहे।
दर्द की चीख दीवारों से टकरा गई,
बंद कमरों में चेहरे सँवरते रहे।
जिंदगी भर जले रोशनी के लिए,
और हम ही रोशनी को तरसते रहे।
दूसरों के लिए दीप बनते रहे,
अपने हिस्से के अँधेरे निगलते रहे।
हमने सच बोलने की सजा भी सही,
झूठ वाले मगर रोज़ फलते रहे।
वक्त के साथ रिश्ते भी बिखरते गए,
हम उन्हें जोड़ने में ही लगते रहे।
जिनके हाथों में था मुल्क का आईना,
वो ही तस्वीर को रोज़ धुंधलाते रहे।
हमने मेहनत के पथ पर कदम जब रखे,
राह में सैकड़ों पत्थर उछलते रहे।
यासीन अपने कलम की स्याही से देख,
दर्द के सिलसिले शेर बनते रहे।
✍️ पत्रकार यासीन खान
भावार्थ:
यह ग़ज़ल समाज की विडंबनाओं, अन्याय और संघर्ष की कहानी कहती है। जिन लोगों को सबसे अधिक सहारे, पानी, रोशनी और मदद की जरूरत थी, वे ही उससे वंचित रह गए। जब घर जल रहा था तब लोग तमाशबीन बने रहे। पूरी जिंदगी दूसरों के लिए उजाला करने वाले लोग स्वयं अंधेरे में जीते रहे। यह रचना मेहनतकश, ईमानदार और संघर्षशील इंसानों के दर्द, उपेक्षा और समाज की संवेदनहीनता को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
इससे पहले कि कोई और चुरा ले मुझको,
अपनी जुल्फ़ों के घने साये में छुपा ले मुझको।
तेरी चाहत की पनाहों में सुकून मिलता है,
अपने एहसास की दुनिया में बसा ले मुझको।
मैं भटकता हुआ इक ख़्वाब हूँ वीरानों में,
अपने दिल की किसी धड़कन से मिला ले मुझको।
मैंने चादर की तरह सौंप दिया है ख़ुद को,
तेरी मर्ज़ी है कि ओढ़े या बिछा ले मुझको।
मेरी हस्ती का कोई और सहारा भी नहीं,
अपने विश्वास की बाहों में समा ले मुझको।
मैं तेरे इश्क़ की खुशबू से महक जाऊँगा,
अपने जज़्बात के गुलशन में सजा ले मुझको।
ये ज़माना तो हमेशा से कसौटी ठहरा,
अपने दिल के किसी कोने में बचा ले मुझको।
मेरी आँखों में कई दर्द के दरिया हैं मगर,
अपनी पलकों की छांव देकर हँसा ले मुझको।
मैं कोई फूल नहीं जो यूँ बिखर जाऊँगा,
अपने अरमानों की माला में पिरो ले मुझको।
तेरी चाहत का सफ़र उम्र भर आसान रहे,
अपने हर ख़्वाब की मंज़िल सा बना ले मुझको।
यासीन तेरी मोहब्बत का तलबगार है आज,
अपने एहसास की दुनिया में बसा ले मुझको।
✍️ पत्रकार यासीन खान 🖋️
यह ग़ज़ल प्रेम, समर्पण और विश्वास की गहराई को व्यक्त करती है। शायर अपने प्रिय से कहता है कि दुनिया की भीड़ और परिस्थितियों से पहले वह उसे अपनी मोहब्बत की पनाह में छुपा ले। यहाँ "जुल्फ़ों का अंधेरा" सुरक्षा, अपनापन और प्रेम का प्रतीक है।
"मैंने चादर की तरह सौंप दिया है खुद को" पंक्ति में शायर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को प्रिय के हवाले कर देता है। वह कहता है कि अब उसके जीवन, भावनाओं और सपनों पर प्रिय का अधिकार है। वह चाहे उसे सम्मान दे, अपने दिल में जगह दे या अपने जीवन का हिस्सा बना ले, यह सब उसकी इच्छा पर निर्भर है।
पूरी ग़ज़ल में प्रेमी का निस्वार्थ समर्पण झलकता है। वह अपने प्रिय के साथ केवल प्रेम नहीं, बल्कि विश्वास, अपनापन और जीवनभर का साथ चाहता है। उसकी इच्छा है कि वह प्रिय की दुनिया का अभिन्न हिस्सा बन जाए और उसकी खुशियों, सपनों तथा भावनाओं में हमेशा शामिल रहे।
ग़ज़ल यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं मांगता, बल्कि समर्पण, विश्वास और अपनापन चाहता है। जब किसी के प्रति प्रेम पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, तब व्यक्ति स्वयं को उसके हवाले कर देता है और उसकी खुशी में ही अपनी खुशी तलाशता है।
✍️ पत्रकार यासीन खान 🖋️
"मोहब्बत की सबसे खूबसूरत पहचान समर्पण है, और समर्पण की सबसे बड़ी निशानी विश्वास।"

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