🔥 "सेवा का सौदा नहीं होता" 🔥

 🔥 "सेवा का सौदा नहीं होता" 🔥



मैंने पत्थरों में जान भरी थी,

तुमने उनमें दाम लगा दिए…

मैंने “हर हर महादेव” लिखकर जगाया,

तुमने मंदिर को भी नाम बेच दिए…


तीस साल की तपस्या थी मेरी,

ना कोई सौदा, ना कोई हिसाब था,

मैंने तो बस शिव को जिया था,

तुम्हारे लिए वो भी एक चुनाव था…


गुफाओं की खामोशी में,

मैंने भक्ति का दीप जलाया था,

हर एक दीवार, हर एक कोना,

अपने खून-पसीने से सजाया था…


जब धरती ने खुद शिवलिंग उगला,

वो चमत्कार भी मैंने देखा था,

उस क्षण में भी मेरे हाथों ने,

श्रद्धा का ही रेखा खींचा था…


दो यज्ञों की ज्वाला में,

मैंने अपना सर्वस्व जलाया,

पर अंत में उसी अग्नि ने,

मेरा ही नाम मिटाया…


जिसे “बाबा” बनाकर पूजते थे,

वो अब राजनीति का खेल खेल रहा है,

जिसे कंधों पर बैठाया हमने,

वही आज हमें ही धकेल रहा है…


ये मंदिर मेरा कर्म था,

तुमने इसे कारोबार बना दिया,

मेरी भक्ति को ठुकराकर,

अपने लालच का दरबार सजा लिया…

पर सुन लो—


मैं ना टूटा हूँ, ना झुका हूँ,

बस सच के साथ खड़ा हूँ,

शिव मेरे भीतर हैं अब भी,

मैं आज भी उतना ही बड़ा हूँ…


तुम मंदिर से मुझे निकाल सकते हो,

पर मेरे “महादेव” को नहीं…

मेरी आवाज़ दबा सकते हो,

पर मेरे विश्वास को नहीं…

✍️

रामआश्रय बिंद

आर्टिस्ट एवं पत्रकार

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