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132 केवी डाला सबस्टेशन में कई लाख की सरकारी संपत्ति गायब!

 

स्टोर की सुरक्षा से लेकर JE की भूमिका तक सवालों के घेरे में, SUV की संदिग्ध एंट्री और आउटसोर्सिंग टेंडर भी जांच के रडार पर


सोन की आवाज न्यूज़ 
रिपोर्टर राम पुकार प्रसाद


डाला/सोनभद्र।
132 केवी डाला विद्युत पारेषण सबस्टेशन के सरकारी स्टोर से कीमती तांबा, पीतल और विद्युत उपकरणों के कथित रूप से गायब होने का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। कई लाख रुपये मूल्य की सरकारी संपत्ति के गायब होने की शिकायत के बाद जहां विभागीय स्तर पर चोरी की घटना बताई जा रही है, वहीं मीडिया कर्मियों ने पूरे प्रकरण में अंदरूनी मिलीभगत, सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही और विभागीय जिम्मेदारी की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्टोर नंबर-1 और स्टोर नंबर-2 से कीमती सरकारी सामग्री गायब होने की बात सामने आई है। घटना को लेकर जेई लव कुमार सिंह की ओर से थाना चोपन में शिकायत देकर अज्ञात लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। विभागीय पक्ष में स्टोर की छत की शीट तोड़कर अंदर प्रवेश किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, मीडिया कर्मियों का कहना है कि पूरे घटनाक्रम की परिस्थितियों की बारीकी से जांच किए बिना मामले को केवल अज्ञात चोरों तक सीमित करना कई महत्वपूर्ण सवालों को अनुत्तरित छोड़ देगा।

सरकारी स्टोर से सामान गायब, आखिर जिम्मेदार कौन?

स्टोर में सरकारी विद्युत सामग्री की सुरक्षा और अभिरक्षा किस अधिकारी अथवा कर्मचारी की जिम्मेदारी थी? स्टोर में प्रवेश किस-किसके पास था? चाबी और एक्सेस की व्यवस्था क्या थी? घटना से पहले और बाद में स्टोर में कौन-कौन पहुंचा? इन सवालों के जवाब जांच के लिए बेहद अहम हैं।

मीडिया कर्मियों का आरोप है कि बिना किसी स्पष्ट बाहरी सेंधमारी के कीमती सामान के गायब होने की परिस्थितियों की भी जांच होनी चाहिए। वहीं विभागीय शिकायत में छत की शीट क्षतिग्रस्त कर चोरी किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में मौके का तकनीकी निरीक्षण, फोरेंसिक जांच और स्टोर की स्थिति का भौतिक सत्यापन पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

UP64 AU 1342 नंबर की SUV पर भी उठे सवाल

मामले में UP64 AU 1342 नंबर की Mahindra SUV की आवाजाही को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। मीडिया कर्मियों का दावा है कि उक्त वाहन सबस्टेशन के स्टोर के पास पहुंचा और सुरक्षा जांच के दौरान वाहन को लेकर जेई से फोन पर बातचीत हुई, जिसके बाद वाहन को बाहर जाने दिया गया।

यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह जांच का गंभीर बिंदु है कि वाहन कब परिसर में आया, किस उद्देश्य से आया, किसके निर्देश पर उसे प्रवेश अथवा निकासी मिली और गेट रजिस्टर में इसकी क्या प्रविष्टि दर्ज है।

CCTV फुटेज और गेट एंट्री रजिस्टर की जांच से इस दावे की वास्तविकता आसानी से स्पष्ट हो सकती है।

मीडिया के सवालों से बचने का आरोप, पारदर्शिता पर सवाल

घटना की जानकारी जुटाने पहुंचे पत्रकारों ने जब मामले को लेकर सवाल पूछने का प्रयास किया तो जेई लव कुमार सिंह मीडिया के सवालों का सामना करने के बजाय वहां से चले गए। पत्रकारों को स्टोर का निरीक्षण कराने और पूरी जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

हालांकि, जेई के चोरी में संलिप्त होने का कोई निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। उनकी भूमिका सहित सभी अधिकारियों, कर्मचारियों और सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होना ही पूरे मामले का सच सामने ला सकता है।

आउटसोर्सिंग टेंडर भी जांच के घेरे में

सबस्टेशन पर आउटसोर्सिंग के माध्यम से तैनात कर्मचारियों की व्यवस्था को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मीडिया कर्मियों के मुताबिक निर्धारित संख्या में कर्मचारियों का टेंडर होने के बावजूद मौके पर वास्तविक रूप से कम कर्मचारी ड्यूटी करते पाए जा रहे थे।

यदि यह आरोप सही है तो अटेंडेंस रजिस्टर, ड्यूटी रोस्टर, वेतन भुगतान, टेंडर दस्तावेज और मौके पर कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति का मिलान कराया जाना जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि विभागीय अभिलेखों में दर्ज कर्मचारियों और वास्तविक रूप से ड्यूटी करने वालों में कोई अंतर है या नहीं।

2017 से एक ही स्थान पर तैनाती पर भी उठे सवाल

जेई लव कुमार सिंह की लंबे समय से सोनभद्र में तैनाती को लेकर भी मीडियाकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। आरोप है कि वह वर्ष 2017 से लगातार इसी क्षेत्र में तैनात हैं। स्थानांतरण नीति के अनुपालन और उनकी लंबी तैनाती की विभागीय जांच की मांग भी उठाई गई है।

हालांकि, किसी अधिकारी की लंबे समय तक तैनाती मात्र से भ्रष्टाचार अथवा अनियमितता साबित नहीं होती। इसलिए तैनाती संबंधी नियमों, पूर्व आदेशों और सक्षम अधिकारियों द्वारा दी गई अनुमति की भी जांच आवश्यक है।

अधिकारियों तक शिकायत, फिर भी कार्रवाई का इंतजार

मामले की जानकारी अधीक्षण अभियंता, विद्युत पारेषण मंडल मिर्जापुर सहित संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाए जाने की बात कही गई है। इसके बावजूद मीडियाकर्ताओं का कहना है कि अब तक ऐसी कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आई है जिससे यह लगे कि पूरे मामले की स्वतंत्र और व्यापक जांच शुरू हो चुकी है।

सरकारी संपत्ति से जुड़ा मामला होने के कारण अब जिम्मेदार उच्चाधिकारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि कई लाख रुपये मूल्य की विभागीय सामग्री आखिर किसकी निगरानी में थी और वह सबस्टेशन से बाहर कैसे पहुंची?


इन बिंदुओं पर तत्काल जांच की जरूरत

◆ स्टोर नंबर-1 और 2 का तत्काल भौतिक सत्यापन कराया जाए।

◆ स्टॉक रजिस्टर और मौके पर उपलब्ध सामग्री का मिलान कराया जाए।

◆ घटना के समय की CCTV फुटेज सुरक्षित कर जांची जाए।

◆ UP64 AU 1342 वाहन की गेट एंट्री और निकासी की जांच हो।

◆ गेट रजिस्टर एवं सुरक्षा गार्डों के बयान दर्ज किए जाएं।

◆ स्टोर की चाबी और प्रवेश व्यवस्था की जांच की जाए।

◆ चोरी की शिकायत के साथ-साथ अंदरूनी मिलीभगत की आशंका की भी जांच हो।

◆ आउटसोर्सिंग टेंडर, अटेंडेंस रजिस्टर, ड्यूटी रोस्टर और भुगतान अभिलेखों का मिलान कराया जाए।

◆ जेई सहित संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाए।

◆ यदि सरकारी धन अथवा संपत्ति के नुकसान की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों से रिकवरी कराई जाए।

सबसे बड़ा सवाल—सरकारी स्टोर आखिर सुरक्षित क्यों नहीं रहा?

132 केवी जैसे महत्वपूर्ण विद्युत पारेषण केंद्र में यदि कई लाख रुपये की सरकारी सामग्री गायब होने की शिकायत सामने आती है तो यह केवल चोरी का मामला नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल है।

अब निगाहें पुलिस और विद्युत विभाग की जांच पर हैं। जांच में CCTV, गेट रजिस्टर, स्टॉक रिकॉर्ड, स्टोर की एक्सेस व्यवस्था और संबंधित कर्मचारियों के बयान सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि सरकारी सामग्री वास्तव में चोरी हुई, सुरक्षा में चूक हुई या फिर पूरे घटनाक्रम के पीछे कोई अंदरूनी खेल था।

फिलहाल सवाल बड़ा है—कई लाख की सरकारी संपत्ति गायब हुई तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

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